एक साथ रिटायर हो रहे हैं दो बड़े देशों के क्लाइमेट वार्ताकार

Hridayesh Joshi18 जन॰. 2024
कॉप28 के मंच पर जॉन कैरी और चीन के झी झेनहुआ। फोटो: Courtesy @ClimateEnvoy on X

कॉप28 के मंच पर जॉन कैरी और चीन के झी झेनहुआ। फोटो: Courtesy @ClimateEnvoy on X


जलवायु परिवर्तन वार्ता के सबसे बड़े मंच पर कई बरसों के साथी रहे दो शख्स एक साथ रिटायर हो रहे हैं। अमेरिका के जॉन कैरी और चीन के झी झेनहुआ।

चीन और अमेरिका धुर विरोधी महाशक्तियां हैं लेकिन यही दुनिया के दो सबसे बड़े कार्बन उत्सर्जक भी हैं और दुनिया की दो सबसे बड़ी इकोनॉमी भी।

आज वर्ल्ड इकोनॉमी में एक तिहाई हिस्सा इन दो देशों का है और दुनिया के कुल कार्बन उत्सर्जन का 40% से अधिक यही दो देश करते हैं। ऐसे में दोनों देशों के लंबे समय तक वार्ताकार रहे ये शख्स एक साथ रिटायर हो रहे हैं तो क्लाइमेट वार्ता में रुचि रखने वालों को इनके बारे में जानना चाहिए।

झी 2007 से ही अंतर्राष्ट्रीय मंच पर चीन की क्लाइमेट पॉलिसी के अगुआ रहे हैं और बहुत तैयारी के साथ कड़ा मोल-तोल करते हैं। डॉ मनमोहन सिंह के समय भारत के प्रमुख क्लाइमेट वार्ताकार रहे श्याम सरन अपनी पुस्तक “How India Sees the World” में याद करते हैं कि कैसे झेनहुआ ​​ने सार्वजनिक रूप से अपने ही प्रधान मंत्री को फटकार दिया था और उन पर संयुक्त राज्य अमेरिका की अत्यधिक मांगों को मानने का आरोप लगाया था।

सरन ने लिखा है, ”झी का गुस्सा बड़ा ही असामान्य और अप्रत्याशित था। किसी अधिकारी के लिए सार्वजनिक रूप से अपने ही प्रधान मंत्री से असहमत होना किसी भी देश में अकल्पनीय होगा, और चीन जैसी तानाशाही और कड़ी हाइरार्की वाले देश में तो और भी अधिक।

ऐसे में यह जानना दिलचस्प है कि झी ने जहां भारत और अन्य लोकतांत्रिक देशों के वार्ताकारों के साथ बड़ा ही सहज रिश्ता बनाये रखा वहीं अमेरिका के साथ कूटनीतिक रिश्तों में नोंकझोंक के बाद भी कैरी के साथ पुल बांधे रखा।  

वियतनाम युद्ध में अहम भूमिका निभा चुके जॉन कैरी कभी अमेरिका की राष्ट्रपति पद की दौड़ में भी थे लेकिन उस ऊंचाई तक वह भले न पहुंच पाए लेकिन क्लाइमेट वार्ता का अहम हिस्सा रहे हैं। उनको 2013 में बराक ओबामा ने विदेश मंत्री  बनाया और 2015 की महत्त्वपूर्ण पेरिस संधि में उन्होंने झेनहुआ के साथ मिलकर काम किया। फिर 2016 में ट्रम्प राष्ट्रपति बने तो क्लाइमेट संधि को डस्ट बिन में डाल दिया गया और कैरी की छुट्टी हो गई लेकिन झेनहुआ चीन की नुमाइंदगी करते रहे और जर्मनी, पोलैंड और स्पेन में हुई वार्ताओं में छाए रहे।

फिर ट्रम्प की हार और बाइडेन के आते ही कैरी की वापसी हुई। इस बीच झी — जो  कुछ समय के लिए रिटायर हो गए थे —  उनकी भी वापसी हो गई। दो महाशक्तियों के इन दूतों की कैमिस्ट्री इतनी अच्छी है कि झी की दोबारा नियुक्ति को कैरी की वापसी से जोड़कर देखा जाता है।

हाल में दुबई जलवायु परिवर्तन वार्ता में झी अपने नाती-पोतों को भी साथ लाए और उन्होंने कैरी के लिए “हैप्पी बर्थ डे” गाया।

जहां चीन ने झी की जगह नये वार्ताकार की घोषणा कर दी है वहीं कैरी से कमान कौन संभालेगा यह अमेरिका में इस साल राष्ट्रपति चुनाव के नतीजों पर निर्भर करता है।

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