सरकारों के जीवाश्म ईंधन उत्पादन के इरादे 1.5°C के वादे से मेल नहीं खाते

Swati Joshi22 अक्टू॰. 2021
Photo: Gerry Machen/Flickr

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  1. जलवायु परिवर्तन सम्मेलन से ठीक पहले यूएनईपी और प्रमुख रिसर्च संस्थानों की रिपोर्ट जीवाश्म ईंधन उत्पादन पर चिन्ता जताते हैं
  2. जीवाश्म ईंधन उत्पादन की रफ्तार से नेट ज़ीरो का लक्ष्य नहीं हासिल हो सकता
  3. ग्लोबल वॉर्मिंग के संकट को देखते हुये भारत के पास जीवाश्म ईंधन उत्पादन के लिये कोई नीति नहीं है। 

सरकारों की योजना 2030 में जीवाश्म ईंधन की मात्रा का दोगुना से अधिक उत्पादन करने की है, जो कि वार्मिंग को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने के अनुरूप नहीं  होगा। COP26 से ठीक नौ दिन पहले जारी हुई , द प्रोडक्शन गैप रिपोर्ट से पता चलता है कि बढ़ी हुई जलवायु महत्वाकांक्षाओं और  नेट-ज़ीरो  प्रतिबद्धताओं के बावजूद, वर्तमान प्रोडक्शन गैप काफी हद तक 2019 में सामने आई पहली रिपोर्ट की तुलना में अपरिवर्तित है।

रिपोर्ट प्रमुख अनुसंधान संस्थानों और संयुक्त राष्ट्र के पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) द्वारा तैयार की गई है और यह भारत सहित 15 प्रमुख उत्पादक देशों का प्रोफाइल बताती है। द प्रोडक्शन गैप रिपोर्ट सरकार में कोयला, तेल और गैस के नियोजित उत्पादन और पेरिस समझौते की तापमान सीमाओं को पूरा करने के अनुरूप वैश्विक उत्पादन स्तरों के बीच के अंतर को देखा गया है ।

क्या दुनिया तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने की दिशा में हैं?

रिपोर्ट के अनुसार सरकार की उत्पादन योजनाओं और अनुमानों से पता चलता है कि 2030 में लगभग 240% अधिक कोयला, 56% अधिक तेल और 71% अधिक गैस पैदा होगी। गैस उत्पादन 2020 और 2040 के बीच सबसे अधिक बढ़ने का अनुमान है।

2019 की प्रोडक्शन गैप रिपोर्ट जारी होने के बाद, कई देशों ने महत्वाकांक्षी ग्रीनहाउस गैस (जीएचजी) उत्सर्जन में कमी के लक्ष्यों की घोषणा की, जिसमें नेट ज़ीरो का संकल्प भी शामिल है। रिपोर्ट में  कहा गया है कि सकारात्मक विकास के बावजूद कुछ ही देशों ने इन लक्ष्यों पर कार्रवाई शुरू की है।

संयुक्त राष्ट्र की जलवायु प्रक्रिया और अन्य जलवायु नीतियों के तहत 2020 के मध्य तक देशों ने नेशनली डेटरमाइंड कंट्रिब्यूशंस (एनडीसी) में उत्सर्जन में कमी के लक्ष्यों की घोषणा की थी। रिपोर्ट से पता चलता है  कि सरकारें अपने लक्ष्यों के विपरीत अधिक उत्पादन स्तर की योजना बना रही हैं।

कोरोना  फंडिंग का कितना हिस्सा जीवाश्म ईंधन में गया ?

रिपोर्ट से पता चलता है कि कोविड की शुरुआत के बाद से, G20 देशों ने जीवाश्म ईंधन की खपत और उत्पादन गतिविधियों के लिए नए फंड में 300 बिलियन अमरीकी डालर का निवेश किया है। इसमें कहा गया है कि सरकारों ने अपने कुछ कोविड -19 रिकवरी फण्ड को स्वच्छ ऊर्जा पर खर्च किया है, लेकिन जीवाश्म ईंधन पर खर्च की गई राशि अधिक है।

हाल के वर्षों में G20 देशों ने जीवाश्म ईंधन उत्पादन के लिए नए अंतरराष्ट्रीय वित्त को उल्लेखनीय रूप से कम किया है,  रिपोर्ट से पता चलता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि मल्टीलेटरल डेवलपमेंट बैंक  (एमडीबी) और जी-20 डेवलपमेंट फाइनेंस इंस्टीटूशन  (डीएफआई) के पास 2 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक के एसेट है, जो कि उन्होंने भविष्य में जीवाश्म ईंधन उत्पादन गतिविधियों से बाहर करने वाली नीतियों में लगाएं  है।

ल्यूसिल ड्यूफोर, सीनियर पॉलिसी एडवाइजर, इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट (आईआईएसडी) के अनुसार , “जीवाश्म ईंधन उत्पादन के लिए अंतर्राष्ट्रीय समर्थन में कटौती के लिए विकास वित्त संस्थानों के शुरुआती प्रयास आशा देनेवाला हैं। ग्लोबल वार्मिंग को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने के लिए ठोस और महत्वाकांक्षी जीवाश्म ईंधन बहिष्करण नीतियों द्वारा इन परिवर्तनों का पालन करने की आवश्यकता है।” 

भारत के पास कोई नीति नहीं

रिपोर्ट के अनुसार, जीवाश्म ईंधन उत्पादन में क्रमिक कमी और एक जस्ट ट्रांजीशन के लिए भारत के पास संघीय (फेडरल) स्तर पर कोई नीति नहीं है।

मई 2020 में पीएम मोदी द्वारा घोषित आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत, सरकार ने 2023-24 तक कोयला में आत्मनिर्भर बनने की मांग की है। पिछले साल कई मंत्रालयों ने संयुक्त रूप से 2019 से 2024 तक कोयला उत्पादन में लगभग 60%  (730 मिलियन टन से 1,149 मिलियन टन)  की बढ़ोतरी करने के लिए एक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया, जिसमें भूमि अधिग्रहण में बाधाओं को दूर करना और अन्वेषण के लिए निर्माण क्षमता शामिल है। देश ने इसी अवधि में कुल तेल और गैस उत्पादन को 40% से अधिक बढ़ाने का लक्ष्य भी  रखा है।

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