कॉप30 में भारत का कड़ा संदेश: क्लाइमेट जस्टिस के बिना कोई  समझौता नहीं

Editorial Team30 नव॰. 2025
फोटो: Agência Brasil/Flickr

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भारत ने बेलेम में आयोजित संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन कॉप30 में ब्राज़ील के समावेशी नेतृत्व के लिए अपना ‘दृढ़ समर्थन’ व्यक्त किया और सम्मेलन में लिए गए कई निर्णयों का स्वागत किया। भारत ने वार्ता के नतीजों पर संतोष जताया, लेकिन यह भी कहा कि इसे जलवायु परिवर्तन रोकने के लिए ठोस नीतिगत सफलता नहीं कहा जा सकता।

भारत ने ग्लोबल गोल ऑन अडैप्टेशन (GGA) में हुई प्रगति की सराहना करते हुए कहा कि यह विकासशील देशों की अनुकूलन जरूरतों को मान्यता देता है। भारत ने विकसित देशों की जलवायु वित्त देने की दशकों पुरानी जिम्मेदारियों पर ज़ोर दिया और पेरिस समझौते के अनुच्छेद 9.1 पर आगे बढ़ने के लिए ब्राज़ील की राष्ट्रपति पद टीम का धन्यवाद किया।

भारत ने जस्ट ट्रांज़िशन मैकेनिज़्म की स्थापना को कॉप30 का सबसे बड़ा परिणाम बताया और उम्मीद जताई कि इससे वैश्विक स्तर पर जलवायु न्याय को मजबूती मिलेगी।

भारत ने एकतरफा व्यापार-संयमित जलवायु उपायों पर चर्चा की अनुमति देने के लिए भी ब्राज़ील का आभार जताया और कहा कि ऐसे कदम विकासशील देशों के लिए हानिकारक हैं।

भारत ने निष्पक्ष, समावेशी और न्यायसम्मत जलवायु कार्रवाई के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई।

जलवायु संकट से भारत के निर्यात उद्योगों पर बढ़ा खतरा: बीसीजी रिपोर्ट

भारत के एल्युमिनियम, आयरन और स्टील जैसे निर्यात-आधारित उद्योग क्लाइमेट एक्शन की कमी के कारण गंभीर जोखिमों का सामना कर रहे हैं। ग्लोबल कंसल्टिंग फर्म बीसीजी के अनुसार, ये जोखिम कंपनियों के मुनाफे, कामकाज और भविष्य की संभावनाओं को प्रभावित कर सकते हैं।

‘क्लाइमेट रिस्क इंडेक्स 2026’ के मुताबिक भारत चरम मौसम घटनाओं से प्रभावित शीर्ष 10 देशों में शामिल है। बीसीजी के सीनियर पार्टनर सुमित गुप्ता ने कहा कि ऐसे घटनाक्रम 2030 तक भारत के GDP का 4.5% तक नुकसान कर सकते हैं। सदी के अंत तक यह नुकसान 6.4% से बढ़कर 10% तक पहुंच सकता है।

बीसीजी के अनिर्बाण मुखर्जी ने बताया कि विशेष रूप से एल्युमिनियम, आयरन और स्टील जैसे क्षेत्रों पर अंतरराष्ट्रीय नियमों का प्रभाव बढ़ रहा है। ईयू का कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज़्म (सीबीएएम) भारत के लगभग 7.7 अरब डॉलर के निर्यात पर असर डाल सकता है।

रिपोर्ट में कहा गया कि सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग जलवायु जोखिम संभालने में कमजोर हैं, जिससे बड़ी कंपनियों की सप्लाई चेन पर सीधा प्रभाव पड़ता है।

ईयू ने 16 ‘स्ट्रैटेजिक’ खनन परियोजनाओं की समीक्षा की मांग ठुकराई

यूरोपीय संघ ने पर्यावरण समूहों की 16 खनन परियोजनाओं की समीक्षा की मांग को खारिज कर दिया है। ईयू ने इन शिकायतों को ‘आधारहीन’ बताया। ये परियोजनाएं कुल 47 रणनीतिक परियोजनाओं की सूची का हिस्सा हैं, जिनका उद्देश्य स्वच्छ ऊर्जा और डिजिटल तकनीक के लिए जरूरी खनिजों की आपूर्ति बढ़ाना है। ये परियोजनाएं स्वीडन से लेकर स्पेन तक कई देशों में स्थित हैं।

पर्यावरण समूहों का आरोप है कि यूरोपीय संघ पर्यावरण मानकों की बजाय जल्द मंजूरी देने को वरीयता दे रहा है। कई परियोजनाएं शुरुआती चरण में हैं और उनके पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन भी पूरा नहीं हुआ है। स्थानीय समुदायों ने भी पानी, जैव विविधता और जीविका पर खतरे की आशंका जताई है।

ईयू ने कहा कि उसे केवल ‘समग्र मूल्यांकन’ करना होता है, जबकि विस्तृत जांच सदस्य देशों की जिम्मेदारी है। सामाजिक और मानवाधिकार प्रभावों की समीक्षा से भी उसने इनकार कर दिया। एनजीओ ने इसे सतही प्रतिक्रिया बताया और कहा कि सस्टेनेबिलिटी के मानदंड सिर्फ ‘औपचारिकता’ बनकर रह गए हैं।

विकाशील देशों ने की औद्योगिक मांस उत्पादन पर जीएचजी टैक्स की मांग

कॉप30 में अफ्रीका और पैसिफिक के 28 निम्न-आय वाले देशों ने मांग की है कि यदि अमीर राष्ट्र औद्योगिक पशुपालन से होने वाले ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को स्वेच्छा से कम नहीं करेंगे, तो उन्हें उत्सर्जन मूल्य निर्धारण (जीएचजी प्राइसिंग) के जरिए इसके नुकसान की भरपाई करनी चाहिए। नाइजीरिया, फिजी, युगांडा, चाड और पापुआ न्यू गिनी सहित कई देशों ने ‘बेलेम डिक्लेरेशन’ पर हस्ताक्षर किए, जिसमें ओईसीडी देशों, यूरोपीय संघ और चीन से औद्योगिक मांस उत्पादन पर जीएचजी टैक्स लगाने की अपील की गई।

इन देशों की कुल आबादी लगभग 1.4 करोड़ है, जो जलवायु परिवर्तन के प्रभाव रोज झेल रही है। घोषणा में कहा गया कि इस टैक्स से मिलने वाली आय का 20% हिस्सा ‘लॉस एंड डैमेज फंड’ में जाना चाहिए।

घोषणा में बताया गया कि वैश्विक जीएचजी उत्सर्जन का एक-तिहाई कृषि और खाद्य प्रणाली से आता है, जिसमें पशुपालन सबसे बड़ा स्रोत है। अमीर देशों में मांस उपभोग विकासशील देशों की तुलना में कई गुना अधिक है। हस्ताक्षरकर्ताओं ने भविष्य की कॉप बैठकों में मांस के अत्यधिक उपभोग में कमी को प्राथमिकता देने की मांग की है।

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